कम पानी वाले क्षेत्रों के लिए वरदान हैं धान की ये किस्में, 110-120 दिनों में मिलेगी बंपर पैदावार

कम पानी वाले क्षेत्रों के लिए वरदान हैं धान की ये किस्में, 110-120 दिनों में मिलेगी बंपर पैदावार

राम-राम किसान भाईयों! खेती-किसानी में आज के समय में सबसे बड़ी चुनौती क्या आ रही है? मौसम का मिजाज बिल्कुल बदल चुका है। कभी सूखा पड़ जाता है, तो कभी बारिश इतनी देर से होती है कि धान का थरहा (नर्सरी) डालने का सही समय ही निकल जाता है। हमारे कई किसान भाई जिनके पास सिंचाई के पक्के साधन नहीं हैं, या जो ऐसे इलाकों में रहते हैं जहाँ भूजल स्तर बहुत नीचे चला गया है, वे हर साल मानसून के भरोसे बैठे रहते हैं। कई बार तो पानी की कमी के कारण लागत भी वसूल नहीं हो पाती और पूरी मेहनत पर पानी फिर जाता है।

लेकिन किसान भाईयों, अब हताश होने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं है। आज विज्ञान और हमारे कृषि वैज्ञानिकों ने मिलकर ऐसी गज़ब की तकनीक और धान की उन्नत किस्में तैयार कर दी हैं, जो कम पानी में, कम लागत में और मात्र 110 से 120 दिनों के भीतर पककर तैयार हो जाती हैं। यानी कम समय में आपकी जेब भी भरेगी और खलिहान में धान के ढेर भी लगेंगे।

आज के इस बेहद विस्तृत लेख में हम आपको ऐसी ही टॉप सूखा-प्रतिरोधी धान की किस्मों, उनकी पैदावार की क्षमता, उनके बोने के सही तरीके और खाद-पानी के ऐसे देसी जुगाड़ बताएंगे जिन्हें अपनाकर आप सूखी धरती से भी सोना उगा सकते हैं। अपनी चौकड़ी जमा लीजिए और इस लेख को पूरा इत्मीनान से पढ़िएगा।

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Table of Contents

1. धान की खेती में समय और पानी का पूरा गणित (110-120 दिन ही क्यों?)

हमारे देहात में एक कहावत बहुत मशहूर है—“का बरषा जब कृषी सुखाने, समय चूकि पुनि का पछताने।” यानी फसल सूखने के बाद कितनी भी बारिश हो जाए, कोई फायदा नहीं होता। परंपरागत रूप से हमारे पूर्वज जो धान लगाते आ रहे हैं (जैसे महामाया, स्वर्णा, या मंसूरी), वे पकने में 140 से लेकर 155 दिन तक का समय ले लेती हैं।

अब जरा ठंडे दिमाग से सोचिए। अगर कोई फसल 150 दिन खेत में खड़ी रहेगी, तो उसे कम से कम 5 से 6 बार भारी सिंचाई की ज़रूरत होगी। अगर सितंबर और अक्टूबर के महीने में पानी नहीं गिरा, तो धान की बालियों में दूध भरते समय दरारें पड़ जाती हैं और दाने खोखले (चफ) रह जाते हैं।

यहीं पर काम आता है 110 से 120 दिनों का जादुई गणित। ये किस्में अगेती (Early Maturing) होती हैं। इनका जीवन चक्र छोटा होता है। इसका मतलब यह है कि जब तक आसमान से मानसून विदा होता है (सितंबर के आखिरी में), तब तक ये किस्में अपना दाना पूरी तरह पका चुकी होती हैं। इन्हें आखिरी के दिनों में अतिरिक्त पानी की दरकार नहीं होती। इसलिए सूखा प्रभावित या कम पानी वाले क्षेत्रों के लिए 110-120 दिन की फसल ही सबसे सुरक्षित और समझदारी भरा सौदा मानी जाती है।

2. कम अवधि वाली सूखा-प्रतिरोधी किस्मों के 5 सबसे बड़े फायदे

अगर आप इस साल अपने खेत में इन कम समय वाली किस्मों को जगह देते हैं, तो आपको क्या-क्या फायदे मिलेंगे, जरा विस्तार से समझिए:

अद्भुत सूखा सहनशीलता: इन किस्मों के पौधों की शारीरिक बनावट ऐसी होती है कि इनकी जड़ें सामान्य धान के मुकाबले ज्यादा गहरी और घनी होती हैं। अगर कल्ले फूटते समय या बालियां निकलते समय 15-20 दिनों तक तेज धूप पड़ जाए और बारिश न हो, तो भी ये पौधे ज़मीन की गहराई से नमी खींचकर खुद को जिंदा रखते हैं।

लागत में भारी कटौती: कम दिन का सीधा मतलब है कम मजदूरी, कम कीटनाशक और कम सिंचाई। अगर आप पंप चलाकर पानी देते हैं, तो आपका डीजल या बिजली का बिल सीधे आधा हो जाता है। आपकी मेहनत और पैसा दोनों बचते हैं।

कीट और बीमारियों का चक्र टूटना: जो फसलें बहुत लंबे समय तक खेत में खड़ी रहती हैं, उनमें तना छेदक (Stem Borer), भूरा माहू (BPH) और ब्लास्ट (झोंका रोग) जैसी महामारियां पैर पसार लेती हैं। कम दिन वाली किस्में इन बीमारियों के उग्र होने से पहले ही कटकर खलिहान में आ जाती हैं।

दोहरी और तेहरी फसल का मौका: अक्टूबर के मध्य या आखिरी हफ्ते तक आपका खेत बिल्कुल साफ और खाली हो जाता है। मिट्टी में हल्की नमी बची रहती है। इस समय आप बिना पलेवा (सिंचाई) किए सीधे चना, तिवरा, अलसी, सरसों या अगेती गेहूं की बुआई कर सकते हैं। यानी एक ही खेत से साल में दो या तीन फसलें लेकर अपनी आमदनी दोगुनी कर सकते हैं।

चारे की अच्छी गुणवत्ता: चूंकि ये फसलें कम समय में कटती हैं, इसलिए इनका पैरा (पुआल/पशु चारा) बिल्कुल सड़ता नहीं है। यह पशुओं के खाने के लिए पौष्टिक और साफ बना रहता है।

3. कम पानी वाले क्षेत्रों के लिए धान की टॉप 5 उन्नत किस्में (गहन विश्लेषण)

किसान भाइयों, बाजार में तो सैकड़ों किस्में उपलब्ध हैं और हर कंपनी बड़े-बड़े दावे करती है। लेकिन आपको बहकावे में नहीं आना है। आपको सिर्फ उन्हीं किस्मों को चुनना है जिन्हें सरकारी कृषि विश्वविद्यालयों और अनुसंधान केंद्रों ने प्रमाणित किया है। आइए, ऐसी ही 5 धांसू किस्मों का पूरा बही-खाता देखते हैं:

① सहभागी धान (Sahbhagi Dhan) – सूखे का काल

यह किस्म केंद्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (CRRI) और अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (IRRI) की एक अद्भुत खोज है। इसे विशेष रूप से भारत के सबसे ज्यादा सूखा प्रवृत्त इलाकों के लिए ही बनाया गया है।

समय चक्र: यह वैरायटी मात्र 105 से 115 दिनों में पूरी तरह पककर कटने के लिए तैयार हो जाती है।

पैदावार की क्षमता: सामान्य परिस्थितियों में यह 40 से 45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर (यानी लगभग 16 से 18 क्विंटल प्रति एकड़) तक उपज दे देती है।

विशेष गुण: सहभागी धान की सबसे बड़ी ताकत इसकी सहनशीलता है। अगर बुआई या रोपाई के बाद लगातार 20-25 दिन तक पानी न गिरे और खेत में दरारें आ जाएं, तब भी इसका पौधा मरता नहीं है। जैसे ही दोबारा हल्की बारिश होती है, यह वापस उठ खड़ा होता है और तेजी से बढ़ता है। इसके दाने मध्यम मोटे होते हैं और इसका चावल खाने में बहुत हल्का और स्वादिष्ट होता है।

② DRR धान 42 और 44 (DRR Dhan 42/44)

भारतीय चावल अनुसंधान संस्थान, हैदराबाद द्वारा विकसित ये दोनों बहनें (किस्में) आज के समय में कम सिंचाई वाले क्षेत्रों में तहलका मचा रही हैं।

समय चक्र: इन दोनों किस्मों को पकने में 115 से 120 दिन का समय लगता है।

पैदावार की क्षमता: कम पानी की स्थिति में भी ये किस्में 45 से 50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर (18 से 20 क्विंटल प्रति एकड़) की बंपर पैदावार देने का दम रखती हैं।

विशेष गुण: इन किस्मों का तना बहुत ही मजबूत और गठीला होता है। अक्सर देखा जाता है कि जब धान पकने पर आता है और तेज हवा चलती है, तो फसल खेत में सो जाती है (गिर जाती है), जिससे भारी नुकसान होता है। लेकिन DRR 42 और 44 कभी खेत में नहीं गिरतीं। इसके अलावा, इनमें झोंका रोग (Blast) के प्रति गज़ब की रोग प्रतिरोधक क्षमता होती है।

③ स्वर्णा सब-1 (Swarna Sub-1)

हमारे कई किसान भाई स्वर्णा धान के दीवाने हैं क्योंकि इसका दाना चमकदार होता है और पैदावार भारी मिलती है। लेकिन असली स्वर्णा 150 दिन लेती है। वैज्ञानिकों ने उसी स्वर्णा का एक अपग्रेड वर्जन तैयार किया है, जिसे ‘स्वर्णा सब-1’ कहते हैं। यह उन इलाकों के लिए रामबाण है जहाँ मौसम का कोई भरोसा नहीं होता—यानी कभी सूखा तो कभी अचानक बाढ़ आ जाना।

समय चक्र: यह 115 से 122 दिनों के भीतर पक जाती है।

पैदावार की क्षमता: यह इन सभी किस्मों में सबसे ज्यादा पैदावार देने वाली किस्म है। यह आराम से 50 से 55 क्विंटल प्रति हेक्टेयर (20 से 22 क्विंटल प्रति एकड़) तक का उत्पादन दे देती है।

विशेष गुण: इसकी सबसे जादुई खासियत यह है कि अगर आपके इलाके में अचानक भारी बारिश हो जाए और आपका पूरा खेत 12 से 14 दिनों तक पानी में पूरी तरह डूब जाए, तो भी यह फसल गलती या सड़ती नहीं है। पानी सूखने के बाद यह दोबारा अपनी ग्रोथ शुरू कर देती है। और अगर पानी कम रहे, तो भी इसकी पैदावार लाजवाब होती है।

④ इंदिरा बारानी धान-1 (Indira Barani Dhan-1)

हमारे छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, ओडिशा और झारखंड के किसान भाइयों के लिए यह वैरायटी किसी सोने की खान से कम नहीं है। रायपुर के इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय (IGKV) द्वारा विकसित यह किस्म यहाँ की लाल-पीली (मटासी और भाठा) मिट्टी के लिए एकदम अनुकूल है।

समय चक्र: यह मात्र 110 से 115 दिनों में पककर तैयार हो जाती है।

पैदावार की क्षमता: इसकी औसत पैदावार 40 से 42 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है।

विशेष गुण: इस किस्म को बहुत ही कम रख-रखाव की ज़रूरत होती है। हमारे देहात में जिसे “कम लागत की खेती” कहते हैं, यह उसके लिए परफेक्ट है। इसे आप सीधे कतार में बुआई (सट्टा या कतार विधि) से लगा सकते हैं। इसके पौधे की पत्तियां चौड़ी और गहरी हरी होती हैं, जो कम धूप और कम पानी में भी अपना भोजन अच्छे से बना लेती हैं।

⑤ नरेन्द्र सूखा धान-3 (Narendra Sukha Dhan-3)

उत्तर प्रदेश (विशेषकर पूर्वांचल और बुंदेलखंड), बिहार और उत्तरी झारखंड के सूखा प्रभावित बेल्ट में इस वैरायटी ने किसानों की तकदीर बदली है। Narendra Dev University of Agriculture and Technology द्वारा इसे तैयार किया गया है।

समय चक्र: यह सबसे फुर्तीली किस्म है, जो मात्र 105 से 110 दिनों में खेत खाली कर देती है।

पैदावार की क्षमता: 35 से 40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर।

विशेष गुण: इस किस्म का सबसे बड़ा फायदा इसका बाजार मूल्य है। इसका चावल थोड़ा पतला और लंबा होता है, जिसकी वजह से मंडियों में इसका भाव मोटे धान से ₹200 से ₹300 प्रति क्विंटल ज्यादा मिलता है। कम पानी के क्षेत्रों के लिए यह एक बहुत ही सुरक्षित और मुनाफेदार सौदा है।

4. खेत की तैयारी और बीज उपचार: बंपर पैदावार की पहली सीढ़ी

किसान भाइयों, अक्सर हम गलती क्या करते हैं? बाजार से महँगा बीज तो ले आते हैं, लेकिन खेत की तैयारी और बीज के संस्कार (उपचार) पर ध्यान नहीं देते। कम पानी वाली खेती में यह लापरवाही भारी पड़ सकती है।

खेत की जुताई का सही तरीका:

गर्मी के दिनों में (मई या जून की शुरुआत में) अपने खेत की एक बार गहरी जुताई कल्टीवेटर या एमबी प्लाउ से जरूर करके छोड़ दें। इससे मिट्टी के अंदर छुपे हुए कीड़ों के अंडे और हानिकारक फंगस तेज धूप से मर जाते हैं। इसके बाद जब मानसून की पहली फुहार पड़े, तब रोटावेटर चलाकर मिट्टी को बिल्कुल भुरभुरा और समतल (प्लेन) कर लें। खेत जितना समतल होगा, पानी उतने ही समान रूप से पूरे खेत में फैलेगा।

बीज उपचार (Seed Treatment) का अचूक नुस्खा:

बीज बोने से पहले उसका उपचार करना उतना ही जरूरी है जितना बच्चे को पोलियो की दवा पिलाना।

रासायनिक तरीका: 1 किलोग्राम बीज के लिए 2 ग्राम कार्बेन्डाजिम (Carbendazim 50% WP) लें। इसे थोड़े से पानी में मिलाकर बीज पर अच्छे से मथ लें और छांव में सुखा लें।

जैविक तरीका: यदि आप रासायनिक दवाओं से बचना चाहते हैं, तो 10 ग्राम ट्राइकोडरमा विरिडी (Trichoderma Viride) प्रति किलो बीज के हिसाब से मिलाकर उपचारित करें।

फायदा: इससे बीज का अंकुरण 95% से ज्यादा होता है और शुरुआती दिनों में लगने वाली जड़ गलन या बख्शानी (Foot Rot) जैसी बीमारियां छू भी नहीं पातीं।

5. सीधी बुआई (DSR विधि): पानी बचाने का सबसे अचूक वैज्ञानिक तरीका

कम पानी वाले इलाकों के लिए पारंपरिक “रोपाई विधि” (जिसमें पहले थरहा तैयार किया जाता है, फिर खेत को कीचड़ या गारा बनाकर पौधों को हाथों से रोपा जाता है) बिल्कुल भी सही नहीं है। रोपाई विधि में बेतहाशा पानी बर्बाद होता है।

इसके बदले आपको अपनानी चाहिए सीधी बुआई विधि (Direct Seeded Rice – DSR)। इसे हमारे छत्तीसगढ़ और देहात में ‘कुर्रा बुआई’ या ‘सट्टा बुआई’ भी कहा जाता है।

विशेषता / अंतरपारंपरिक रोपाई विधिसीधी बुआई (DSR विधि)
पानी की खपतबहुत ज्यादा (खेत में पानी भरकर रखना पड़ता है)30% से 40% तक पानी की बचत
मजदूरी और खर्चथरहा उखाड़ने और रोपने में भारी लेबर खर्चट्रैक्टर या सीड ड्रिल से सीधे बुआई, खर्च बहुत कम
फसल का पकनारोपाई के झटके के कारण फसल 7-10 दिन लेट होती हैफसल 7 से 10 दिन पहले पककर तैयार होती है
जड़ों का विकासजड़ें उखड़ने के कारण कमजोर होती हैंजड़ें शुरू से ही ज़मीन में गहरी और मजबूत होती हैं

सीधी बुआई करने का तरीका:

जब जून के महीने में अच्छी बारिश हो जाए और ज़मीन में पैर सहने लायक नमी आ जाए, तब सीड ड्रिल (Seed Drill) मशीन की मदद से कतार से कतार की दूरी 20 सेंटीमीटर रखते हुए सीधे बीज बो दें। एक एकड़ के लिए लगभग 12 से 15 किलोग्राम बीज की ज़रूरत होती है।

6. सूखा प्रभावित इलाकों के लिए विशेष खाद और पोषण प्रबंधन

कम पानी वाली खेती में खाद डालने की तकनीक सामान्य खेती से थोड़ी अलग होती है। अगर खेत सूखा है और आपने अंधाधुंध यूरिया डाल दिया, तो फसल सुलग (जल) जाएगी। इसलिए खाद का संतुलन समझना बहुत जरूरी है।

① गोबर खाद का जादू:

खेत की आखिरी जुताई के समय प्रति एकड़ कम से कम 3 से 4 ट्रॉली अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद या केंचुआ खाद (वर्मीकंपोस्ट) पूरे खेत में बिखेर दें। गोबर खाद सिर्फ पोषण नहीं देती, बल्कि यह मिट्टी की पानी सोखने की क्षमता (Water Holding Capacity) को बढ़ाती है। जिस मिट्टी में गोबर खाद अच्छी होती है, वह पानी को स्पंज की तरह सोखकर रखती है, जिससे सूखा पड़ने पर भी फसल 15 दिनों तक हरी-भरी रहती है।

② पोटाश (Potash) को कभी न भूलें:

हमारे देश के अधिकांश किसान सिर्फ यूरिया और डीएपी (DAP) डालते हैं और पोटाश को भूल जाते हैं। किसान भाईयों, पोटाश ही वह तत्व है जो पौधे को सूखा सहने की ताकत देता है। यह पौधे के तने को मजबूत बनाता है और पत्तियों के छिद्रों (Stomata) को नियंत्रित करता है ताकि तेज धूप में पौधे के अंदर का पानी भाप बनकर न उड़े।

मात्रा: बुआई के समय प्रति एकड़ 20 किलो म्‍यूरिएट ऑफ पोटाश (MOP) ज़रूर डालें।

③ यूरिया (नाइट्रोजन) देने का सही नियम:

यूरिया को कभी भी एक बार में भारी मात्रा में न फेंकें। इसे तीन बराबर भागों में बांट लें:

पहला भाग: बुआई के 20-25 दिन बाद (कल्ले फूटते समय)।

दूसरा भाग: बुआई के 40-45 दिन बाद (तने में गांठ बनते समय)।

तीसरा भाग: बालियां निकलने से ठीक पहले (गभोट अवस्था में)।

सावधान: यूरिया तभी डालें जब खेत में पर्याप्त नमी हो या मौसम विभाग ने बारिश की भविष्यवाणी की हो।

7. कम पानी में खरपतवार (कचरा) नियंत्रण के अचूक उपाय

सीधी बुआई (DSR) में सबसे बड़ी समस्या जो आती है, वह है खरपतवार या घास-फूस का उगना। चूंकि खेत में पानी भरा नहीं रहता, इसलिए कचरा बहुत तेजी से बढ़ता है और धान के पौधों का सारा खाना-पानी खुद सोख लेता है। इसे रोकने के दो अचूक तरीके हैं:

शुरुआती नियंत्रण (Pre-Emergence): बुआई करने के 24 से 48 घंटे के भीतर, जब मिट्टी में अच्छी नमी हो, तब पेंडिमेथालिन (Pendimethalin 30% EC) 1 लीटर प्रति एकड़ की दर से 200 लीटर पानी में मिलाकर पूरे खेत में स्प्रे कर दें। यह दवा घास के बीजों को उगने ही नहीं देती।

खड़ी फसल में नियंत्रण (Post-Emergence): यदि बुआई के 20-25 दिन बाद खेत में संकरी या चौड़ी पत्ती वाली घास (जैसे सांवा, मोथा) दिखती है, तो बिस्पायरीबैक सोडियम (Bispyribac Sodium 10% SC), जिसे बाजार में ‘नॉमिनी गोल्ड’ या अन्य नामों से जाना जाता है, 80 मिलीलीटर प्रति एकड़ के हिसाब से स्प्रे करें। स्प्रे करते समय खेत में नमी होना बहुत जरूरी है।

8. फसल की कटाई, मड़ाई और भंडारण के जरूरी नियम

जब आपकी 110-120 दिन की फसल पककर तैयार हो जाए, तो कटाई में देरी बिल्कुल न करें। कम अवधि वाली किस्मों की एक विशेषता होती है कि पकने के बाद यदि इन्हें ज्यादा दिन खेत में छोड़ दिया जाए, तो इनके दाने झड़ने लगते हैं।

कटाई का सही समय: जब धान की बालियों के 90% दाने सुनहरे या पीले रंग के हो जाएं और उनमें नमी का स्तर लगभग 20% हो, तब फसल की कटाई कर लेनी चाहिए।

सुखाना और मड़ाई: कटाई के बाद फसल को 2-3 दिन खेत में ही सुखाएं, फिर थ्रेशर या कंबाइन हार्वेस्टर से इसकी मड़ाई करा लें।

भंडारण (Storage): अनाज को कोठी या बोरियों में भरने से पहले अच्छी पक्की धूप में तब तक सुखाएं जब तक कि दानों में नमी 12% से 14% तक न आ जाए। दाने को दांत से चबाने पर अगर ‘कट’ से आवाज आए, तो समझो धान भंडारण के लिए बिल्कुल तैयार है। इससे अनाज में घुन या फंगस नहीं लगती।

9. निष्कर्ष और किसान भाइयों के लिए आखिरी जरूरी सलाह

तो किसान भाइयों, इस पूरे महा-लेख का निचोड़ यही है कि मौसम चाहे कितना भी बेरुखा हो जाए, अगर हमारी रणनीति सही है, तो हमारी फसल कभी फेल नहीं होगी। पानी की कमी का रोना रोने से बेहतर है कि हम समय के साथ बदलें।

यह 110 से 120 दिनों वाली धान की उन्नत किस्में (जैसे सहभागी, DRR 42, इंदिरा बारानी) आज के बदलते परिवेश में सूखा प्रभावित क्षेत्रों के किसानों के लिए किसी कल्पवृक्ष से कम नहीं हैं। ये किस्में न सिर्फ आपके खेत को सूखे की मार से बचाएंगी, बल्कि आपकी लागत आधी करके आपको मुनाफे की गारंटी देंगी।

इस खरीफ सीजन में प्रयोग के तौर पर ही सही, अपने खेत के एक हिस्से में इन सूखा-प्रतिरोधी किस्मों को जगह ज़रूर दें। खुद भी अपनाएं और अपने आस-पास के किसान भाईयों को भी इसके प्रति जागरूक करें।

जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान!

किसान भाइयों, अगर आपको इस लेख में दी गई जानकारी अच्छी लगी हो, तो नीचे कमेंट करके हमें ज़रूर बताएं और अपने गाँव के वाट्सएप ग्रुप में इसे शेयर करना बिल्कुल न भूलें!

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